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प्रेम की कविताएँ और शायरी

कभी एक मुलाक़ात, कभी किसी का साथ और कभी मन में रह गई बात—प्रेम कई रूपों में कविता बनता है। इस संग्रह में गौरव बलोरिया की मोहब्बत और रिश्तों पर लिखी मौलिक हिंदी रचनाएँ पढ़ें।

Original Hindi love poems and romantic shayari by Gourav Baloria. Open any poem to read the complete work.

23 रचनाएँ · गौरव बलोरिया

ना गजरे की बहार

ना गजरे की बहार ना गहनों का भार ना किया कोई श्रृंगार फिर भी कितनी सुंदर हो हाँ कितनी सुंदर हो, तुम कितनी सुंदर हो। तेरी हँसी से खिलते मौसम, तेरी नज़र से महके गुलशन, तेरी हँसी से खिलते मौसम, तेरी नज़र से महके गुलशन, तेरी अदा में ऐसी कशिश है, तुझे देख के खो जाए मन। तेरी ज़ुल्फ़ें काली घटाएँ, तेरी आँखें जादू जगा…

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मैं नशे में हूँ

रूठो न की मुझसे प्यार करो, मैं नशे में हूँ, बातों का मेरी न शुमार करो, मैं नशे में हूँ, नज़रें खुद मिल जाएँगी तुम एहसास करो, इन दूरियों को न इंकार करो, मैं नशे में हूँ, जो बात लबों तक आते-आते रुक गयी थी, उस दर्द पे अब न वार करो, मैं नशे में हूँ, बिछड़े हुए लम्हों को गले आज लगा लो, इस रात को न बेज़ार करो, मैं नशे में हूँ, मेरी आँखों…

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शंभू... मेरे शंभू...

शंभू... मेरे शंभू... भोलेनाथ... तुम पूछत हो काय जिद कर रही, काय तप में खुद को जला रही, जिसको तुम अवधूत कहत हो, मैं उसको अपना मान रही। ना महल चाहिए, ना सोना चाहिए, ना जग का कोई श्रृंगार, जिसके मन में सारा जग बसता, वही मेरा संसार। सिर पे गंगा तो क्या हुआ, वो जग की प्यास बुझाते हैं, गले में साँप भले हों उनके, निर्भय जीना सिखाते हैं। तुम…

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ऐ चाँद, कुछ देर में तुझे घने बादल ढक लेंगे

ऐ चाँद, कुछ देर में तुझे घने बादल ढक लेंगे, बालकनी में बैठे-बैठे हम भी आँखें ढक लेंगे। या तो बरस जाएँगे या हवा दूर इन्हें ले जाएगी, बारिश थमते ही ये भी धीरे-धीरे सरक लेंगे। नज़रें हटेंगी न आसमाँ से चाहे रात गुज़र जाए, तू लौट के जब आएगा पलकें तब झपक लेंगे। काली घटाएँ आने दो अब और अँधेरा छाने दो, जो अश्क छुपाए बैठे हैं चुपके से छलक लेंग…

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तिरे बिन सनम अब गुज़ारा नहीं

तिरे बिन सनम अब गुज़ारा नहीं, बिना तेरे कोई सहारा नहीं। क़रीब आके नज़रें चुराती हो तुम, मगर दिल को पर्दा गवारा नहीं। ये कैसी मोहब्बत ये कैसा असर है, तिरे बिन तो हर लम्हा बे-फ़ैज़ तर है। रगों में लहू बन के बहने लगे तुम, धड़कन को मेरी ये सब कुछ ख़बर है। ज़बाँ कह रही है चले जाओ तुम, मगर आँख का ये इशारा नहीं। तुझे छू के सांसें बहकने लगीं, रहा…

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बिना तेरे कोई सहारा नहीं

तिरे बिन सनम अब गुज़ारा नहीं, बिना तेरे कोई सहारा नहीं। क़रीब आके नज़रें चुराती हो तुम, मगर दिल को पर्दा गवारा नहीं। ज़बाँ कह रही है चले जाओ तुम, मगर आँख का ये इशारा नहीं। तुझे छू के सांसें बहकने लगीं, रहा दिल पे क़ाबू हमारा नहीं। जुदाई की बातें न बोलो कभी, ये दूरी हमें अब गवारा नहीं।

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तुम्हारी कमी उतर आती है कमरे में

ये रात जब चुपचाप मेरी खिड़की पर आकर बैठती है, चाँद नहीं, तुम्हारी कमी उतर आती है कमरे में। कितनी बातें हैं जो किसी से कह नहीं पाया, उन्हें मैंने दिल की तहों में, तुम्हारे इंतज़ार में सँभाल रखा है। जिस दिन तुम मिलोगी, मैं किसी शिकायत से शुरुआत नहीं करूँगा। बस तुम्हारे पास बैठकर अपनी हर सुबह का हिसाब दूँगा, हर शाम का अकेलापन सुनाऊँगा…

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में तुम्हारे शहर आया हूँ, मिलने, आओगी क्या

में तुम्हारे शहर आया हूँ, मिलने, आओगी क्या, दिल भी साथ लाया हूँ, मिलने, आओगी क्या। टेबल रिज़र्व करा दी, शाम भी थाम रखी है, मैंने बस तुम्हें बुलाया है, मिलने, आओगी क्या। तुम्हारे नाम पे नज़्म लिखी है रात भर जाग कर, लबों से आज सुनाऊँगा, सुनने, आओगी क्या। इक तस्वीर बनाई है, जिसके रंग रंग में तुम हो, अगर तुम्हें दिखाऊं तो, देखने, आओगी क्य…

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अगर छाँव हमारी है, तो धूप भी हमारी है

अगर आज हार है, तो कल जीत हमारी है, चुनौतियों से लड़ने की, ये रीत हमारी है। अगर छाँव हमारी है, तो धूप भी हमारी है, सफ़र के हर मौसम से, अब प्रीत हमारी है। मुसीबत के अंधेरों में, जो हाथ थाम ले, हकीकत में वही हिम्मत, मीत हमारी है। लाख गहरा हो अंधेरा, डरा नहीं सकता, उजाले की और चलने की, नीत हमारी है।

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तुम्हारे बाद नहीं, तुम्हारे साथ

तुम मिली, तो ऐसा नहीं हुआ कि दुनिया बदल गई। सड़कें वही रहीं, मौसम वही रहे, लोग भी वैसे ही रहे। बदला तो बस इतना... कि अब हर जगह से वापिस लौट आने का मन करता है तुम्हारे पास। पहले घर सिर्फ़, एक पता हुआ करता था। पहले घर सिर्फ़, एक पता हुआ करता था। अब घर लगता है। मैंने तुम्हें कभी अपनी ज़िंदगी नहीं कहा, क्योंकि ज़िंदगी एक दिन …

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तू मेरे घर तो आ

एक बार कभी फुरसत निकाल कर, तू मेरे घर तो आ, तुझे अपने हाथों की अदरक वाली चाय पिलाऊँगा। हालाँकि, चीनी चाय-पत्ती, कम-ज़्यादा हो सकती है, पर उस एक प्याली में मैं अपना, सारा इश्क़ मिलाऊँगा। पहन-पहन कर सारी शर्टतें, मैं आईने को थकाऊँगा, तुझे कौन-सा रंग पसंद आएगा, यही सोच कर घबराऊँगा। तेरी आहट सुनकर, बिखरापन अलमारी में छुपाऊँगा, "मैं तो हमे…

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कोई चाँद, कोई वादी, कोई नज़ारा नहीं चाहिए,

कोई चाँद, कोई वादी, कोई नज़ारा नहीं चाहिए, मुझे किताबी इश्क़ का सहारा नहीं चाहिए। तू न बोले तो रूठ कर मान जाता हूँ खुद ही, मुझे तेरे बिना एक पल का गुज़ारा नहीं चाहिए। तुझे छूने की चाहत है, पर खुद को रोकता हूँ, जिस्म की तलब का कोई इशारा नहीं चाहिए। तू बस अपना सर मेरे कांधे पे टिकाए रखना, मुझे अपनी रातों में कोई सितारा नहीं चाहिए। …

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