तिरे बिन सनम अब गुज़ारा नहीं
तिरे बिन सनम अब गुज़ारा नहीं, बिना तेरे कोई सहारा नहीं।
क़रीब आके नज़रें चुराती हो तुम, मगर दिल को पर्दा गवारा नहीं।
ये कैसी मोहब्बत ये कैसा असर है, तिरे बिन तो हर लम्हा बे-फ़ैज़ तर है।
रगों में लहू बन के बहने लगे तुम, धड़कन को मेरी ये सब कुछ ख़बर है।
ज़बाँ कह रही है चले जाओ तुम, मगर आँख का ये इशारा नहीं।
तुझे छू के सांसें बहकने लगीं, रहा दिल पे क़ाबू हमारा नहीं।
जुदाई की बातें न बोलो कभी, ये दूरी हमें अब गवारा नहीं।
तुझी से शुरू है तुझी पे ख़तम है, सिवा तेरे कोई हमारा नहीं।
हिंदी भावार्थ
यह कविता प्रेम की उस पराकाष्ठा को दर्शाती है जहाँ प्रेमी अपने अस्तित्व को पूरी तरह से प्रियतम को समर्पित कर देता है। इसमें शब्दों के इनकार और आँखों के इकरार के बीच के मधुर द्वंद्व को खूबसूरती से उकेरा गया है, जो यह दर्शाता है कि सच्चा प्रेम किसी भी प्रकार की दूरी को स्वीकार नहीं करता। अंततः, यह रचना यह स्थापित करती है कि प्रियतम ही जीवन का आदि और अंत है, जिसके बिना जीवन पूरी तरह से निरर्थक है।
English Translation
This poem depicts the pinnacle of love where the lover completely surrenders their existence to the beloved. It beautifully portrays the sweet conflict between verbal denial and the silent acceptance of the eyes, showing that true love does not accept any form of distance. Ultimately, this piece establishes that the beloved is the beginning and end of life, without whom existence is entirely meaningless.