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कोई चाँद, कोई वादी, कोई नज़ारा नहीं चाहिए,

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कोई चाँद, कोई वादी, कोई नज़ारा नहीं चाहिए, मुझे किताबी इश्क़ का सहारा नहीं चाहिए। तू न बोले तो रूठ कर मान जाता हूँ खुद ही, मुझे तेरे बिना एक पल का गुज़ारा नहीं चाहिए। तुझे छूने की चाहत है, पर खुद को रोकता हूँ, जिस्म की तलब का कोई इशारा नहीं चाहिए। तू बस अपना सर मेरे कांधे पे टिकाए रखना, मुझे अपनी रातों में कोई सितारा नहीं चाहिए। मैं जैसा भी हूँ, बस तेरे सामने सच्चा हूँ, मुझे दिखावे का इश्क़ गवारा नहीं चाहिए। तेरे पास आकर ठहर सी गई है धड़कन मेरी, मेरी कश्ती को अब कोई किनारा नहीं चाहिए। एक बार जो सौंप दिया है ये दिल मैंने तुझको, मुझे ये अपना ही दिल अब दोबारा नहीं चाहिए।

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