कोई चाँद, कोई वादी, कोई नज़ारा नहीं चाहिए,
कोई चाँद, कोई वादी, कोई नज़ारा नहीं चाहिए,
मुझे किताबी इश्क़ का सहारा नहीं चाहिए।
तू न बोले तो रूठ कर मान जाता हूँ खुद ही,
मुझे तेरे बिना एक पल का गुज़ारा नहीं चाहिए।
तुझे छूने की चाहत है, पर खुद को रोकता हूँ,
जिस्म की तलब का कोई इशारा नहीं चाहिए।
तू बस अपना सर मेरे कांधे पे टिकाए रखना,
मुझे अपनी रातों में कोई सितारा नहीं चाहिए।
मैं जैसा भी हूँ, बस तेरे सामने सच्चा हूँ,
मुझे दिखावे का इश्क़ गवारा नहीं चाहिए।
तेरे पास आकर ठहर सी गई है धड़कन मेरी,
मेरी कश्ती को अब कोई किनारा नहीं चाहिए।
एक बार जो सौंप दिया है ये दिल मैंने तुझको,
मुझे ये अपना ही दिल अब दोबारा नहीं चाहिए।
हिंदी भावार्थ
यह कविता सच्चे, निश्छल और आत्मिक प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाती है, जहाँ प्रेमी को किसी भौतिक सौंदर्य, दिखावे या शारीरिक आकर्षण की चाह नहीं है। इसमें केवल अपने प्रियतम के सानिध्य, सत्यता और पूर्ण समर्पण की आकांक्षा है, जो प्रेम को वासना से परे एक पवित्र और शाश्वत रूप प्रदान करती है।
English Translation
This poem depicts the pinnacle of true, selfless, and spiritual love, where the lover desires no material beauty, pretense, or physical attraction. It expresses a pure longing only for the beloved's presence, authenticity, and complete surrender, elevating love beyond lust into a sacred and eternal bond.