में तुम्हारे शहर आया हूँ, मिलने, आओगी क्या

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में तुम्हारे शहर आया हूँ, मिलने, आओगी क्या, दिल भी साथ लाया हूँ, मिलने, आओगी क्या। टेबल रिज़र्व करा दी, शाम भी थाम रखी है, मैंने बस तुम्हें बुलाया है, मिलने, आओगी क्या। तुम्हारे नाम पे नज़्म लिखी है रात भर जाग कर, लबों से आज सुनाऊँगा, सुनने, आओगी क्या। इक तस्वीर बनाई है, जिसके रंग रंग में तुम हो, अगर तुम्हें दिखाऊं तो, देखने, आओगी क्या। तुम मेरे लिए खुला आसमान हो, और तुम छत, जहाँ तुम रखो, वहीं रह लूँ, रहने, आओगी क्या। मैं फूल लेके नहीं आया, पर यक़ीन लाया हूँ, जब चाहे परख लेना, बताओ, आओगी क्या। अगर "न" भी कहो, फिर भी शिकायत नहीं होगी, पर एक बार मिल लेना, इतना कर, पाओगी क्या। अगर मिलो तो शायद, ये शहर घर-सा हो जाएगा, मैं सिर्फ़ तुमसे मिलने आया हूँ, बताओ, आओगी क्या।

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