में तुम्हारे शहर आया हूँ, मिलने, आओगी क्या

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में तुम्हारे शहर आया हूँ, मिलने, आओगी क्या, दिल भी साथ लाया हूँ, मिलने, आओगी क्या। टेबल रिज़र्व करा दी, शाम भी थाम रखी है, मैंने बस तुम्हें बुलाया है, मिलने, आओगी क्या। तुम्हारे नाम पे नज़्म लिखी है रात भर जाग कर, लबों से आज सुनाऊँगा, सुनने, आओगी क्या। इक तस्वीर बनाई है, जिसके रंग रंग में तुम हो, अगर तुम्हें दिखाऊं तो, देखने, आओगी क्या। तुम मेरे लिए खुला आसमान हो, और तुम छत, जहाँ तुम रखो, वहीं रह लूँ, रहने, आओगी क्या। मैं फूल लेके नहीं आया, पर यक़ीन लाया हूँ, जब चाहे परख लेना, बताओ, आओगी क्या। अगर "न" भी कहो, फिर भी शिकायत नहीं होगी, पर एक बार मिल लेना, इतना कर, पाओगी क्या। अगर मिलो तो शायद, ये शहर घर-सा हो जाएगा, मैं सिर्फ़ तुमसे मिलने आया हूँ, बताओ, आओगी क्या।
यह कविता प्रेम की निश्छल अभिव्यक्ति, समर्पण और गहरी प्रतीक्षा को दर्शाती है, जहाँ प्रेमी बिना किसी शर्त या दबाव के अपनी प्रियतमा से मिलने की आकुल इच्छा व्यक्त करता है। कवि भौतिक उपहारों के बजाय अपने अटूट विश्वास, कविताओं और यादों के साथ आया है, जो उसके प्रेम की पवित्रता को उजागर करता है। अंततः, यह रचना दर्शाती है कि सच्चा प्रेम केवल प्रिय की उपस्थिति मात्र से ही किसी अनजाने शहर को भी अपना आशियाना बना लेता है।
This poem depicts the pure expression of love, devotion, and deep anticipation, where the lover expresses an anxious desire to meet his beloved without any conditions or pressure. Instead of materialistic gifts, the poet has arrived with his unwavering trust, poems, and memories, highlighting the sanctity of his love. Ultimately, this piece illustrates how true love can transform an unfamiliar city into a home through the mere presence of the beloved.
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