तुम्हारे बाद नहीं, तुम्हारे साथ
तुम मिली,
तो ऐसा नहीं हुआ
कि दुनिया बदल गई।
सड़कें वही रहीं,
मौसम वही रहे,
लोग भी वैसे ही रहे।
बदला तो बस इतना...
कि अब हर जगह से वापिस लौट आने का मन करता है
तुम्हारे पास।
पहले घर सिर्फ़, एक पता हुआ करता था।
पहले घर सिर्फ़, एक पता हुआ करता था।
अब घर लगता है।
मैंने तुम्हें कभी अपनी
ज़िंदगी नहीं कहा,
क्योंकि ज़िंदगी एक दिन
ख़त्म हो जाती है।
मैंने तुम्हें अपनी
आदत भी नहीं कहा,
क्योंकि आदतें वक़्त के साथ
बदल जाती हैं।
मैंने तुम्हें अपनी
ख़ामोशी कहा है।
जिसे हर कोई सुन नहीं सकता,
मगर जिसके बिना,
मैं पूरा नहीं होता।
तुम्हें मालूम है,
मोहब्बत का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा
"आई लव यू" कहना नहीं होता।
बल्कि किसी थके हुए दिन के
आख़िर में, भीड़ से निकलते हुए,
जेब से फ़ोन निकालना,
और बिना सोचे सबसे पहले,
तुम्हारा नंबर डायल करना होता है।
तब समझ आता है...
मोहब्बत अब इज़हार में नहीं,
आदतों के बीच रहने लग गयी है
हिंदी भावार्थ
यह कविता प्रेम के उस गहरे और शांत स्वरूप को दर्शाती है जहाँ प्रेम किसी बाहरी बदलाव का नहीं, बल्कि आंतरिक रूपांतरण का नाम है। इसमें प्रियतम के आने से दुनिया नहीं बदलती, बल्कि 'घर' का अर्थ बदल जाता है और वह एक सुरक्षित ठिकाना बन जाता है। प्रेम यहाँ शब्दों के दिखावे या क्षणिक आदतों से परे, जीवन की उस मौन पूर्णता और सहजता में समाया है जो हर थके हुए दिन के अंत में सुकून देती है।
English Translation
This poem portrays the deep and quiet essence of love, where love is not about external changes but an internal transformation. With the arrival of the beloved, the world does not change, but the meaning of 'home' shifts from a mere address to a sanctuary of comfort. Love here transcends verbal expressions or fleeting habits, residing instead in that silent completeness and effortless comfort that brings peace at the end of a tiring day.