ऐ चाँद, कुछ देर में तुझे घने बादल ढक लेंगे

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ऐ चाँद, कुछ देर में तुझे घने बादल ढक लेंगे, बालकनी में बैठे-बैठे हम भी आँखें ढक लेंगे। या तो बरस जाएँगे या हवा दूर इन्हें ले जाएगी, बारिश थमते ही ये भी धीरे-धीरे सरक लेंगे। नज़रें हटेंगी न आसमाँ से चाहे रात गुज़र जाए, तू लौट के जब आएगा पलकें तब झपक लेंगे। काली घटाएँ आने दो अब और अँधेरा छाने दो, जो अश्क छुपाए बैठे हैं चुपके से छलक लेंगे। ये इश्क़ का मौसम है या मौसम है रुखसत का, इस मौसम में दिल जुदा होकर भी धड़क लेंगे। तारीकी के इस मौसम में आस बची है इतनी सी, तुझे पाने की हसरत में दुनिया सारी भटक लेंगे
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