तुम्हारी कमी उतर आती है कमरे में

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ये रात जब चुपचाप मेरी खिड़की पर आकर बैठती है, चाँद नहीं, तुम्हारी कमी उतर आती है कमरे में। कितनी बातें हैं जो किसी से कह नहीं पाया, उन्हें मैंने दिल की तहों में, तुम्हारे इंतज़ार में सँभाल रखा है। जिस दिन तुम मिलोगी, मैं किसी शिकायत से शुरुआत नहीं करूँगा। बस तुम्हारे पास बैठकर अपनी हर सुबह का हिसाब दूँगा, हर शाम का अकेलापन सुनाऊँगा, और वो सारे किस्से जो सिर्फ़ तुम्हारे सुनने के लिए बचे हैं। तुमसे मोहब्बत किसी वादे की वजह से नहीं है, ये तो उस साँस की तरह है जिसका एहसास तब होता है जब वो कुछ पल के लिए रुक जाए।
यह कविता विरह, मौन प्रतीक्षा और निश्छल प्रेम की एक बेहद गहरी और संवेदनशील अभिव्यक्ति है। कवि अपने एकाकीपन में प्रियतम की अनुपस्थिति को एक जीवंत उपस्थिति की तरह महसूस करता है, जहाँ अनकही बातें और शिकायतें नहीं, बल्कि केवल आत्मीयता साझा करने की तड़प है। प्रेम को जीवनदायिनी साँस के समान बताना इस बात को रेखांकित करता है कि सच्चा प्रेम किसी वादे का मोहताज नहीं, बल्कि अस्तित्व का अनिवार्य हिस्सा है।
This poem is a deeply poignant expression of separation, silent longing, and unconditional love. The poet experiences the beloved's absence as a tangible presence in moments of solitude, holding onto unspoken words not to complain, but to share intimate moments of life. Comparing love to the vital breath highlights that true love is not bound by promises, but is an essential, involuntary part of one's very existence.
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