शंभू... मेरे शंभू...
शंभू... मेरे शंभू...
भोलेनाथ...
तुम पूछत हो काय जिद कर रही,
काय तप में खुद को जला रही,
जिसको तुम अवधूत कहत हो,
मैं उसको अपना मान रही।
ना महल चाहिए, ना सोना चाहिए,
ना जग का कोई श्रृंगार,
जिसके मन में सारा जग बसता,
वही मेरा संसार।
सिर पे गंगा तो क्या हुआ,
वो जग की प्यास बुझाते हैं,
गले में साँप भले हों उनके,
निर्भय जीना सिखाते हैं।
तुम कहते हो भोले हैं वो,
हाँ, भोले ही तो भाते हैं,
छल-कपट की इस दुनिया में,
सच्चे कहाँ मिल पाते हैं?
शंभू... शिव शंभू...
मेरे भोलेनाथ...
ना खपरा हो, ना छपरा हो,
कैलाश ही घर हो जाएगा,
जिस आँगन में शंकर होंगे,
वहीं मेरा मन रम जाएगा।
भस्म लगाएँ, जटा बढ़ाएँ,
मुझको उससे क्या लेना,
जिसने विष पी जग को बचाया,
उसके संग ही है जीना।
आधा चंदा माथे पर है,
आधा मैं बन जाऊँगी,
वो यदि शिव हैं इस संसार के,
मैं शक्ति कहलाऊँगी।
तुम पूछत हो काय जिद कर रही,
काय तप में दिन काट रही,
जिसको पाने जन्म लिया है,
उसको कैसे छोड़ दूँ मैं?
ना धन माँगूँ, ना मान माँगूँ,
ना कोई दरबार,
मुझको बस वो शंभू चाहिए,
बाकी सब बेकार।
भोले... मेरे भोले...
भोले... मेरे भोले...
जिसे जग कहता भोलेनाथ,
वही मेरे प्राणों के नाथ।
जय-जय शिव शंभू!
हर-हर महादेव!