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तू मेरे घर तो आ

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एक बार कभी फुरसत निकाल कर, तू मेरे घर तो आ, तुझे अपने हाथों की अदरक वाली चाय पिलाऊँगा। हालाँकि, चीनी चाय-पत्ती, कम-ज़्यादा हो सकती है, पर उस एक प्याली में मैं अपना, सारा इश्क़ मिलाऊँगा। पहन-पहन कर सारी शर्टतें, मैं आईने को थकाऊँगा, तुझे कौन-सा रंग पसंद आएगा, यही सोच कर घबराऊँगा। तेरी आहट सुनकर, बिखरापन अलमारी में छुपाऊँगा, "मैं तो हमेशा ऐसा हूँ", कुछ ऐसा रौब दिखाऊँगा। तू बातें करेगी दुनिया की, मैं सिर्फ तुझे देख पाऊँगा, अचानक जो मिलेंगी आँखे, मैं झट से नज़रें चुराऊँगा। सोचूँगा कि आज बता ही दूँ, तू कितनी प्यारी लगती है, पर होंठों तक आते-आते, बातों में मैं उलझ जाऊँगा। डर होगा कि तू मेरी, इन बातों से बोर ना हो जाए, तो चुप होकर बस तेरी बातें, मैं सुनता चला जाऊँगा फिर बीच ही उठकर मैं, वो अदरक वाली चाय ले आऊँगा, तुझे चुस्कियां लेते देख, मैं बस देखता ही रह जाऊँगा। पूछूँगा बहुत झिझक के साथ, "चाय ठीक तो बनी है ना?" तेरी एक मीठी सी 'हाँ' सुनकर, मैं सुकून से भर जाऊँगा। जब जाने का वक़्त आएगा, मैं घड़ी की सुइयाँ रोक दूंगा, तुझे दरवाज़े तक छोड़ने में, मैं जान-बूझ कर रुक जाऊँगा। कहने को तो कह दूँगा, 'अलविदा' बड़े ही आराम से, तू जब तक ओझल ना हो जाए, चौखट पे खड़ा रह जाऊँगा।
यह कविता निश्छल प्रेम, संकोच और प्रियतम के आगमन की व्याकुल प्रतीक्षा की एक बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति है। इसमें चाय पिलाने के एक साधारण बहाने के जरिए दिल के गहरे जज्बातों, घबराहट और मौन समर्पण को दर्शाया गया है। यह प्रेम की उस मासूमियत को उजागर करती है जहाँ शब्द कम पड़ जाते हैं और केवल मौन और छोटी-छोटी चेष्टाएँ ही सब कुछ बयां कर देती हैं।
This poem is a beautiful expression of pure love, hesitation, and the anxious anticipation of a beloved's arrival. Through the simple pretext of serving tea, it portrays deep heartfelt emotions, nervousness, and silent devotion. It highlights the innocence of love where words fall short, and only silence and small gestures express everything.
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