Gourav Baloria
Contemporary
Gourav Baloria is the founder of Verseandbooks — a sanctuary for Hindi and English poetry lovers. His verses explore love, longing, solitude, and the quiet beauty of everyday emotions.
लेखन शैली · Style
Lyrical and introspective. Gourav writes with raw honesty, blending simple Hindi with deep emotional undertones. His style feels personal, like a conversation with the reader.
कविताएँ एवं प्रमुख रचनाएँ (43)
एक की मर्ज़ी पर घर गिराना पड़ा
तेरे हिस्से का भी सच छुपाना पड़ा,
हम ख़ुश नहीं थे ये बताना पड़ा।
दो की मर्ज़ी से रक्खी थी बुनियाद जो,
...
मुझे मुझसे ही मिलने के लिए
बिखर जाता हूँ अंदर से तो थोड़ा संभलना पड़ता है
मुझे मुझसे मिलने के लिए उससे मिलना पड़ता है
जब दफ़्तर मे...
तिरे बिन सनम अब गुज़ारा नहीं
तिरे बिन सनम अब गुज़ारा नहीं, बिना तेरे कोई सहारा नहीं।
क़रीब आके नज़रें चुराती हो तुम, मगर दिल को पर्दा ग...
कभी शोरगुल वाले किसी मयखाने
कभी शोरगुल वाले किसी मयखाने
की हँसी में मुकम्मल हो जाती है,
कभी एक साल पुराने खाली कमरे में
उम्र भर का...
तुम आज के दौर के लड़के हो
तुम आज के दौर के लड़के हो,
तुम्हें कई पुरानी दीवारें गिरानी हैं।
माँ की थकती आँखों की नमी पढ़नी है,
और प...
बिना तेरे कोई सहारा नहीं
तिरे बिन सनम अब गुज़ारा नहीं,
बिना तेरे कोई सहारा नहीं।
क़रीब आके नज़रें चुराती हो तुम,
मगर दिल को पर्...
तिरंगा हमारा सब से ऊँचा रहे
देश का कोई भी गली कूचा रहे
तिरंगा हमारा सब से ऊँचा रहे
हर किसी के दिल में हो आरज़ू
भारत का क़द सबसे ऊ...
तुम्हारी कमी उतर आती है कमरे में
ये रात जब चुपचाप
मेरी खिड़की पर आकर बैठती है,
चाँद नहीं,
तुम्हारी कमी उतर आती है कमरे में।
कितनी बाते...
में तुम्हारे शहर आया हूँ, मिलने, आओगी क्या
में तुम्हारे शहर आया हूँ, मिलने, आओगी क्या,
दिल भी साथ लाया हूँ, मिलने, आओगी क्या।
टेबल रिज़र्व करा दी,...
जहालत, बेहुनरी के बाज़ार में, ऐसा हो नहीं सकता था
दिखावे के समंदर में, सुकून खो नहीं सकता,
बीज मालूमात का, कोई जी में बो नहीं सकता।
किताबें छोड़ दीं, और ...