एक की मर्ज़ी पर घर गिराना पड़ा

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तेरे हिस्से का भी सच छुपाना पड़ा, हम ख़ुश नहीं थे ये बताना पड़ा। दो की मर्ज़ी से रक्खी थी बुनियाद जो, एक की मर्ज़ी पर घर गिराना पड़ा। तूने इक साँस में कह दिया था “नहीं”, ख़ुद को जीना नए सिरे से सिखाना पड़ा। तेरा जाना तो सबको दिखाई दिया, मुझको हर रोज़ उस घर में आना पड़ा। हाथ आदत से दो कप उठाने लगे, याद आया तो इक फिर हटाना पड़ा। लोग पूछें तो कहता हूँ “हम अलग हुए”, तेरे फ़ैसले में ख़ुद को मिलाना पड़ा।
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