एक की मर्ज़ी पर घर गिराना पड़ा

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तेरे हिस्से का भी सच छुपाना पड़ा... हम ख़ुश नहीं थे... बताना पड़ा। तेरे हिस्से का भी सच छुपाना पड़ा... दो की मर्ज़ी से रखी थी बुनियाद जो... इक की मर्ज़ी पे घर गिराना पड़ा। तेरे हिस्से का भी सच छुपाना पड़ा... तूने इक साँस में कह दिया था नहीं... ख़ुद को फिर से जीना सिखाना पड़ा। तेरे हिस्से का भी सच छुपाना पड़ा... तेरा जाना तो सबको दिखाई दे गया... मुझको हर रोज़ उस घर में आना पड़ा। तेरे हिस्से का भी सच छुपाना पड़ा... हाथ आदत से दो कप उठाने लगे थे... याद आते ही इक कप हटाना पड़ा। तेरे हिस्से का भी सच छुपाना पड़ा... दुनिया समझी कि दोनों रज़ा थे इसमें... अपनी चाहत को झूठा बताना पड़ा। तेरे हिस्से का भी सच छुपाना पड़ा... तेरे हिस्से का भी सच छुपाना पड़ा... तेरे हिस्से का भी सच छुपाना पड़ा... हम ख़ुश नहीं थे... बताना पड़ा।
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