जहालत, बेहुनरी के बाज़ार में, ऐसा हो नहीं सकता था
दिखावे के समंदर में, सुकून यूँ खो नहीं सकता था,
ज़हर मालूमात का कोई, जी में बो नहीं सकता था।
किताबें छोड़ दीं और, अदब बड़ों का भूल बैठे हम,
शॉर्टकट का सफ़र, इल्म गहरा संजो नहीं सकता था।
सियासत की हवा ने आज धड़ों में यूँ हमें बाँटा,
लहू अपनों का अपनों से, कोई यूँ धो नहीं सकता था।
समझ और तर्क की ताक़त, ज़ेहन से ख़त्म है वरना,
रंगों के भेद से मनकों को, कोई पिरो नहीं सकता था।
पसंद आया जिसे जो कुछ, उसे ही सच समझ बैठा,
हक़ीक़त जानता तो चैन से वो सो नहीं सकता था।
ये कैसी रील्स की आँधी है, जिसने अक़्ल धुँधला दी,
वरना बिना परखे जज़्बात, कोई ढो नहीं सकता था।
अँधेरे की भीड़ में इल्म का दावा तो सब करते,
पर इस खोखलेपन पर कोई रो नहीं सकता था।
'फ़क़ीरनामा' में लिख देता हक़ीक़त मैं ज़माने की,
जहालत के इस बाज़ार में सच हो नहीं सकता था।
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