जहालत, बेहुनरी के बाज़ार में, ऐसा हो नहीं सकता था
दिखावे के समंदर में, सुकून खो नहीं सकता,
बीज मालूमात का, कोई जी में बो नहीं सकता।
किताबें छोड़ दीं, और अदब भी भूल बैठे हम,
शॉर्टकट का सफ़र, इल्म संजो नहीं सकता।
सियासत की हवा ने आज धड़ों में ऐसा बांटा,
लहू अपनों बहा गैरों पे इल्जाम हो नहीं सकता।
समझ और तर्क की ताक़त, ज़ेहन से ख़त्म हैं वरना
रंगों के भेद से मनकों को, कोई पिरो नहीं सकता।
पसंद आया जिसे जो कुछ, उसे ही सच समझ बैठा,
हक़ीक़त समझ जायेगा जब चैन से सो नहीं सकता।
ये कैसी रील्स की आँधी है, जिसने अक़्ल धुँधला दी,
वरना अफ़वाहों का बोझ, कोई उम्र भर ढो नहीं सकता।
अँधेरे की भीड़ में इल्म का दावा तो सब करते है,
बिना परखे आज किसी दावे पे यक़ीं हो नहीं सकता।
'फ़क़ीरनामा' में लिख देता हक़ीक़त मैं ज़माने की,
जहालत के दौर में हर सच बेख़ौफ़ हो नहीं सकता।
हिंदी भावार्थ
यह कविता आधुनिक समाज में नैतिक पतन, सतही ज्ञान और सोशल मीडिया के दौर में खोती जा रही तार्किकता पर एक तीखा प्रहार है। कवि दर्शाता है कि कैसे दिखावे, राजनीतिक विभाजन और अफवाहों के प्रभाव में आकर मनुष्य ने अपनी वास्तविक समझ, संवेदनशीलता और सत्य को स्वीकार करने का साहस खो दिया है। अज्ञानता के इस दौर में बिना सोचे-समझे किसी भी दावे पर विश्वास करना और सत्य को दबाना ही आज की कड़वी हकीकत बन चुका है।
English Translation
This poem is a sharp critique of moral decline, superficial knowledge, and the loss of rationality in the era of social media. The poet highlights how, under the influence of ostentation, political division, and rumors, humanity has lost its true understanding, empathy, and the courage to accept the truth. In this age of ignorance, blindly believing unverified claims and suppressing the truth has become the bitter reality of our times.