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कहानी है क़लम की

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जो अधूरी बातें थीं दिल में, अब कहानी है क़लम की। तू खामोश रहा हर बार, पर आँखें सब कह जाती थीं, अब उन चुप लफ़्ज़ों की गूंजें, पहचान है क़लम की। हमने-तुमने जो नहीं कहा, वो लफ़्ज़ों में ढलते हैं, तेरे हर एक सन्नाटे की अब तर्ज़ुमान है क़लम की। हर मुलाक़ात की ख़ुशबू अब तक साँसों में ज़िंदा है, उन थमे लम्हों को फिर से साँसें मिलती हैं क़लम की। जो भीग गई थी उस रात तन्हा मेरी खिड़की भी, अब उसी बारिश से लिखी हर दास्तान है क़लम की। अब न शिकवा, न तकरार, न चाहत का कोई दावा, पर जो बचा है दरमियाँ वो पहचान है क़लम की।
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