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तो फिर मेरा क्या क़सूर

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तू हँसे और मैं बहक जाऊँ तो फिर मेरा क्या क़सूर मैं महसूस कर लूँ गहराई तो फिर मेरा क्या क़सूर तुझसे बातों में बढ़ती है मिलने की तलब हर बार तू रोक ले अपने क़दमों को तो फिर मेरा क्या क़सूर जो ख़्वाब साथ में बुने थे अब तुझसे रूठ गए मैं उन्हें हर रात मनाऊँ तो फिर मेरा क्या क़सूर हर मौसम संग बदलती है वादों की तारीख़ें मैं उम्मीदों को फिर बाँधूँ तो फिर मेरा क्या क़सूर तू कह दे थोड़ा और सही और वक़्त गुज़र जाए अब और सब्र ना हो पाए तो फिर मेरा क्या क़सूर तू कहे सफ़र मुश्किल है और रास्ते थकाते हैं मैं हर मोड़ पे रुक कर ठहरूँ तो फिर मेरा क्या क़सूर तू मुझे धड़कन कहती थी अब नाम नहीं लेती मैं तन्हाई से रिश्ता बाँधूँ तो फिर मेरा क्या क़सूर मैंने पूछा उससे, अगर है मोहब्बत दोनों ओर, वो बोली यही हल है, तो फिर मेरा क्या क़सूर।
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