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बसंत

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चल रही है हवा, मचल रहा अमरुद का पेड़ गर्म है तवा, तप रही चूल्हे पे रोटी की कोर महका रहीं खुशबुएँ, गुलाबी कलियाँ हर ओर चहचहा रही हैं गलियां, गूंज रहा बच्चों का शोर छत पर कौवा काँव-काँव कर, दे रहा संदेश करो स्वागत की तैयारी, आ गए मेहमान घर की ओर लहराती हवाओं में, सीटी बजाये चीड़ का पेड़ फैलाकर रंगीन पंख, मोर खींचे ध्यान अपनी ओर मदमस्त हुईं आँखें, देख प्रियतम का अलंकार बसंती दोपहरी भी देख रही, सिर्फ सजनी की ओर शुरू करो बनाना टोली, कुछ ही दिनों में है होली मांगें गुलाल-पिचकारी, मच रहा बच्चों का शोर फल-फूल रही हर वनस्पति, नवयौवन से खिली धरा मुबारक हो बसंत की, मस्ती और उमंग भरी भोर
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