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ज़िंदगी कहाँ इतनी आसान

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अब रुक सा जाता हूँ, कुछ करने से पहले, सोचने लगता हूँ, कुछ कहने से पहले। ठोकरें खाकर अब, संभलने लगा हूँ मैं, चार दिन की ज़िंदगी, कहाँ इतनी आसान! तलाशता हूँ खामोशी, शहर के मकानों में, गुज़री थी उम्र मेरी, आम की छाँव में। मुद्दतें हुईं शहर से, चाँद को भी गुज़रे, शहर की ये ज़िंदगी, कहाँ इतनी आसान! घूमना मैं चाहता हूँ, अजनबी शहर में, डूबना मैं चाहता हूँ, वक़्त की लहर में। जिस्म ढल जाएगा जब, हो जाएगा बेजान, रूह चलती ही रहेगी, सफ़र कहाँ है आसान!
यह कविता जीवन की जटिलताओं, शहरीकरण की नीरसता और मानवीय अस्तित्व के गहरे संघर्ष को दर्शाती है। कवि अतीत की सरल यादों और वर्तमान की यांत्रिक दौड़ के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है, जहाँ वह समझता है कि शरीर नश्वर है पर आत्मा का यह कठिन सफर अनंत है। यह जीवन के अनुभवों से सीखकर परिपक्व होने और शांति की खोज की एक मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है।
This poem reflects upon the complexities of life, the monotony of urbanization, and the deep struggle of human existence. The poet attempts to find a balance between the simple memories of the past and the mechanical rush of the present, realizing that while the body is mortal, the soul's arduous journey is eternal. It is a poignant expression of maturing through life's experiences and the quest for inner peace.
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