तू ही तो है
मेरे इश्क़ की सबसे पावन नदी, तू ही तो है,
मेरी रूह की आख़िरी तिश्नगी, तू ही तो है।
क्या झेलम, चिनाब, और रावी, या फिर तावी,
हर इक नीर की बहती सी सादगी, तू ही तो है।
सतलुज, व्यास, गंगा, जमुना या नर्मदा हो,
इन लहरों की मीठी सी रवानगी, तू ही तो है।
कृष्णा, कावेरी, लूनी, चम्बल हो या हो तिस्ता,
हर घाट पे जो गूँजे वो कहानी, तू ही तो है।
लोहित हो, बेतवा, काली, घाघरा या कम्बण,
इन सब में छलकती हुई रवानी, तू ही तो है।
कश्मीर से कन्याकुमारी, दिल्ली, मुम्बई, असम,
हर सम्त मेरे इश्क़ की दीवानगी, तू ही तो है।
मैं तेरा भगीरथ हूँ, और तू है मेरी पूजा,
मेरे दिल के मन्दिर की हर बंदगी, तू ही तो है।
कोई मैला कर दे जो तुझको, तो मैं तड़प जाऊँ,
मेरे अश्कों की, साँसों की ताज़गी, तू ही तो है।
मैं मछली हूँ तेरे ही जल की, निकल के मर जाऊँ,
मेरा अंत भी तू है, और ज़िंदगी, तू ही तो है।
हिंदी भावार्थ
यह कविता प्रेम की उस पराकाष्ठा को दर्शाती है जहाँ प्रेमी अपनी प्रियतमा को भारत की सभी पवित्र नदियों के प्रवाह, सादगी और दिव्यता के रूप में देखता है। कवि के लिए उसका प्रेम केवल एक भावना नहीं, बल्कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला एक आध्यात्मिक विस्तार है, जिसमें वह भगीरथ की भाँति समर्पित है। अंततः, यह रचना दर्शाती है कि प्रियतम ही कवि के जीवन का एकमात्र आधार, उसकी आत्मा की प्यास और उसके अस्तित्व का आदि व अंत है।
English Translation
This poem depicts the pinnacle of love where the lover perceives his beloved as the flow, simplicity, and divinity of all the sacred rivers of India. For the poet, his love is not just an emotion but a spiritual expanse stretching from Kashmir to Kanyakumari, in which he is devoted like Bhagiratha. Ultimately, this creation shows that the beloved is the sole foundation of the poet's life, the thirst of his soul, and the beginning and end of his existence.