चेहरे पे उसने एक नया चेहरा सजा लिया
चेहरे पे उसने एक नया चेहरा सजा लिया,
सच्चे मेरे ख़ुलूस को खिलौना बना लिया।
दिल में नहीं थी चाहत तो कह देते तुम साफ,
क्यों झूठे इल्ज़ामों में मुझे फँसा लिया।
करते रहे तुम मेरा सिर्फ वक़्त ही ख़राब,
महफ़िल में मेरे नाम को रुसवा करा लिया।
हम चुप रहे कि प्यार का तमाशा न हो,
उसने मुझे ही बेवफ़ा सबको बता लिया।
उड़ना था उनको किसी और के आसमान में,
बस कुछ पल मेरी शाख़ पे डेरा बसा लिया।
यारों ये कैसा इश्क़ है, ये कैसा दौर है,
अपना कह कर मुझे गैरों सा आज़मा लिया।
रोता है क्यों 'फ़क़ीर' तू इस झूठे शहर में,
अच्छा हुआ कि वक़्त पे ख़ुद को बचा लिया।
हिंदी भावार्थ
यह कविता प्रेम में मिले धोखे, पाखंड और आहत आत्मसम्मान की गहरी अभिव्यक्ति है। इसमें कवि उस दर्द को बयां करता है जहाँ उसके सच्चे समर्पण का मज़ाक उड़ाया गया और स्वार्थ के लिए उसे बदनाम किया गया। अंततः, यह रचना इस झूठी दुनिया में समय रहते संभल जाने और अपनी गरिमा को बचा लेने के आत्म-बोध को दर्शाती है।
English Translation
This poem is a profound expression of betrayal, hypocrisy, and wounded self-respect in love. The poet conveys the pain of having his sincere devotion mocked and being defamed for someone else's selfish motives. Ultimately, the work reflects the self-realization of saving one's dignity and recovering in time from a deceitful world.