चेहरे पे उसने एक नया चेहरा सजा लिया
चेहरे पे उसने एक नया चेहरा सजा लिया,
सच्चे मेरे ख़ुलूस को खिलौना बना लिया।
दिल में नहीं थी चाहत तो कह देते तुम साफ,
क्यों झूठे इल्ज़ामों में मुझे फँसा लिया।
करते रहे तुम मेरा सिर्फ वक़्त ही ख़राब,
महफ़िल में मेरे नाम को रुसवा करा लिया।
हम चुप रहे कि प्यार का तमाशा न हो,
उसने मुझे ही बेवफ़ा सबको बता लिया।
उड़ना था उनको किसी और के आसमान में,
बस कुछ पल मेरी शाख़ पे डेरा बसा लिया।
यारों ये कैसा इश्क़ है, ये कैसा दौर है,
अपना कह कर मुझे गैरों सा आज़मा लिया।
रोता है क्यों 'फ़क़ीर' तू इस झूठे शहर में,
अच्छा हुआ कि वक़्त पे ख़ुद को बचा लिया।
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