तुम्हें दिल लगाना भी नहीं आता।

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छुपाना भी नहीं आता, जताना भी नहीं आता। ये कैसा सितम है सनम, कि दिल दुखाना भी नहीं आता, और दिल लगाना भी नहीं आता। निगाहों में मचलती हैं, हज़ारों अनकही बातें, मगर होंठों तक उनको, ले के आना भी नहीं आता। भँवर में छोड़ रखी है, मेरी कश्ती मोहब्बत की, बचाना भी नहीं आता, डुबाना भी नहीं आता। हमें तुमसे मोहब्बत है, भला कैसे कहें तुमसे, तुम्हें तो मेरी खामोशी, समझ पाना भी नहीं आता। उलझ कर रह गए हैं हम, तेरी इन्हीं अदाओं में, गले लगना नहीं आता, और छोड़ जाना भी नहीं आता।

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