हम खामोश क्यों हैं
हम खामोश क्यों हैं, क्यों हमारी जुबां पर ताले हैं?
ज़िंदगी निगलने को यहाँ, खुले मौत के नाले हैं।
कोई रसूख के नशे में, आबरू किसी की लूटता है,
कानून का हर पहरेदार, उसके आगे घुटने टेकता है।
अमीरज़ादे की गाड़ी जब, खून से सड़कें रंगती है,
सज़ा के नाम पे, बस एक निबंध की स्याही छपती है।
कोई नफरत का ज़हर बोता, कोई सरेआम नोच खाता है,
वो हंसते हुए बच निकलते, इंसाफ बस देखता रह जाता है।
और हम?
हम बस खबरें देखते, दो दिन का शोक मनाते हैं,
अपनी रिज़्क की अंधी दौड़ में, फिर सब कुछ भूल जाते हैं।
अब सह लेते हैं हर ज़्यादती, सर झुकाने की आदत हो गयी है,
देख तमाशा आगे बढ़ जाने की, अब हमारी फितरत हो गयी है।
पर याद रहे ऐ मेरे दोस्त, गर आज न तुमने सवाल किया,
गर आज किसी और के दर्द पे, तुमने अपना होंठ सी लिया।
तो कल जब ये अंधा सिस्टम, तेरे घर का दरवाज़ा खटखटाएगा,
तेरी चीखों को सुनने तब, यहाँ कोई भी आगे ना आएगा।
इसलिए तोड़ दो ये खामोशी, अब आवाज़ उठाना लाज़िम है,
वरना इस बहरे सिस्टम में, हमारी जान की कीमत नाकाफ़ी है।
इसलिए
अगर ज़िंदा है इस मुल्क में... तो उठ, सवाल पूछ, और हिसाब कर।
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