हर इक नज़ारे में देखो ख़ुदा का साया है

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हर इक नज़ारे में देखो ख़ुदा का साया है, ये ज़िंदगी का नया मौसम क्या रंग लाया है। गुलों की शाख़ पे पत्तों का आज मेला है, महकती कलियों का जादू क्या रंग लाया है। हवा में झूमते पेड़ों की वो हँसी सुन लो, परिंदों का ये तराना क्या रंग लाया है। पुकारता है कोई दूर से हमें 'उस्ताद', नज़र की प्यास में ये दिल क्या रंग लाया है। अभी तो धूप थी आँगन में, शाम ढलने को, ये आसमाँ का नज़ारा क्या रंग लाया है। निगाह-ए-यार की वो इक अदा जो देखी थी, उसी के बाद से हर पल क्या रंग लाया है। घरों में आज है होली का ये अनोखा समाँ, गुलाल-ए-इश्क़ ये दिल पे क्या रंग लाया है। नया है दौर ये ज़ाहिर में और बातिन में, हर इक तरफ़ ये तमाशा क्या रंग लाया है।
यह कविता प्रकृति के कण-कण में ईश्वरीय सत्ता और सौंदर्य की उपस्थिति को दर्शाती है, जहाँ जीवन का हर नया बदलाव एक उत्सव की तरह प्रतीत होता है। कवि बाहरी प्रकृति के दृश्यों और आंतरिक प्रेम के रंगों के माध्यम से यह संदेश देता है कि जब दृष्टि में प्रेम और अध्यात्म का रंग घुल जाता है, तो सृष्टि का हर नज़ारा अलौकिक और आनंदमयी बन जाता है। यह रचना बाह्य जगत और अंतर्मन के सुंदर समन्वय को खूबसूरती से अभिव्यक्त करती है।
This poem depicts the presence of divine existence and beauty in every particle of nature, where every new change in life feels like a celebration. Through the imagery of external nature and the colors of inner love, the poet conveys that when the vision is dissolved in the colors of love and spirituality, every sight in creation becomes divine and blissful. This work beautifully expresses the exquisite harmony between the external world and the inner self.
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