छात्र नदी होते हैं...

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पिछले कुछ दिनों में देश ने एक ऐसा दौर देखा, जहाँ हजारों छात्र अपनी आवाज़ लेकर सड़कों पर उतरे। कहीं प्रदर्शन हुए, कहीं लाठीचार्ज, कहीं गिरफ्तारियाँ, तो कहीं संवाद की जगह टकराव दिखाई दिया। सत्ता और छात्रों के बीच खिंची इस दूरी ने एक सवाल छोड़ दिया कि क्या सवाल पूछना भी अब टकराव माना जाएगा? इन्हीं घटनाओं को देखते हुए मन में एक विचार आया कि छात्र किसी भी देश की नदी की तरह होते हैं। उन्हें दिशा दी जा सकती है, उनसे जीवन उपजता है, लेकिन अगर उनके रास्ते को ज़बरदस्ती रोका जाए, तो वही शांत धारा एक दिन सैलाब बन जाती है। पहाड़ों से उतरते, सपनों से भरे, शोर नहीं करते, बस अपना रास्ता चुनते हैं। जिधर ज्ञान की ज़मीन मिले, उधर मुड़ जाते हैं, जिस हाथ में भरोसा दिखे, उसी का हाथ पकड़ लेते हैं। नदी को मोड़ना आसान है, पर रोकना नहीं। जब उसके रास्ते में पत्थर रखे जाते हैं, बांध खड़े किए जाते हैं, तो वह बहना नहीं छोड़ती, बस अपना हिसाब बदल देती है। फिर एक दिन वही शांत धारा सैलाब बनकर लौटती है। उस वक़्त न पत्थर बचते हैं, न दीवारें, न घमंड। जो सोचते हैं डंडों से सवाल मर जाएंगे, उन्हें शायद नदियों का स्वभाव नहीं मालूम। आवाज़ दबती नहीं, बस इकट्ठी होती है। आज इस मुल्क में हवा भी सवाल करती है, पानी भी, सड़कें भी, नदियाँ भी। कहीं गंदगी बह रही है, कहीं भ्रष्टाचार, कहीं बाबूशाही की मोटी फाइलों में ज़िंदगी अटकी हुई है। रोटी, नौकरी, इम्तिहान, इलाज, हर मोड़ पर आम आदमी जी नहीं रहा, बस किसी तरह गुज़र रहा है। और जब जीना सिर्फ़ जीवित रहना है, किसी तरह। तो सबसे पहले छात्र बेचैन होते हैं। क्योंकि उनके पास खोने को सत्ता नहीं, सिर्फ़ भविष्य होता है। इसलिए... छात्रों को दुश्मन मत समझो, वे किसी तख़्त के भूखे नहीं। वे तो बस एक साफ़ बहती नदी हैं। उन्हें रास्ता दोगे, तो खेत सींचेंगे, शहरों को जीवन देंगे। लेकिन... अगर उन्हें रोकने की ज़िद करोगे, उनकी आवाज़ पर पहरा बैठाओगे, तो याद रखना, नदी हारती नहीं। वह बस एक दिन इतनी बड़ी हो जाती है कि बांध नहीं बचते, इतिहास बदल जाता है।

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