मैंने दिल के हुजरे में तेरी तस्वीर बना ली है

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मैंने दिल के हुजरे में तेरी तस्वीर बना ली है, तुमने ही दरमियाँ इक लकीर बना ली है। चंद मीठे बोल क्या बोले तूने इन फासलों से, मैंने उसी धोखे की एक तक़दीर बना ली है। मेरी सच्ची वफ़ा तेरे लिए बस वक़्त गुज़ारी है, तूने मेरे जज़्बातों से इक जागीर बना ली है। ना तू अपनाता है मुझको, ना ही ठुकराता है मुझे, तेरे इस भरम ने इश्क़ की तासीर बना ली है। जानता हूँ कि मुकम्मल नहीं हो सकता ये रिश्ता, मैंने खुद ही अपने पैरों की ज़ंजीर बना ली है। हक़ीक़त में तू पास नहीं, ये खबर है इस दिल को, तेरी झूठी बातों की मैंने ताबीर बना ली है। तेरी ये बेरुखी और दूरियाँ हर पल जान लेती हैं, तेरी अनदेखी ने मेरे लिए शमशीर बना ली है। तू भी चुप है और 'गौरव' भी तड़पने को राज़ी है, इस उलझे हुए रिश्ते ने कैसी नज़ीर बना ली है!
यह कविता एकतरफा और अधूरे प्रेम की गहरी पीड़ा, आत्म-मोह और भ्रम को दर्शाती है। कवि अपने हृदय में प्रियतम की छवि बसाए हुए है, यह जानते हुए भी कि यह रिश्ता कभी मुकम्मल नहीं हो सकता। वह प्रियतम की बेरुखी और मीठे धोखे को ही अपनी नियति मानकर खुद को इस दर्दनाक बंधन में बांधे रखता है।
This poem depicts the deep pain, self-illusion, and agony of unrequited and incomplete love. The poet enshrines the beloved's image in his heart, fully aware that this relationship can never be fulfilled. He accepts the beloved's indifference and sweet illusions as his destiny, willingly binding himself to this painful bond.
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