ज़िंदगी की हर साँस तुझपे वार दूँ,

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ज़िंदगी की हर इक साँस तुझपे वार दूँ, मरते दम तक तुझे बे-पनाह प्यार दूँ। तू मुझे गर अकेला भी कर दे कभी, तुझपे फिर भी मैं अपनी जाँ हार दूँ। तेरी शर्तें सभी मान कर हमसफ़र, मुस्कुरा कर तुझे अपना संसार दूँ। सोहणेया तेरी हँसी में ही मेरी जान है, तेरे सदके मैं अपना हर क़रार दूँ। थक के लौटूँ जो मैं शाम को तेरे पास, हक़ की दौलत से ख़ुशियों का घर-बार दूँ। रूखी-सूखी जो मिल जाए तेरी सँगत, उस निवाले को दावत सा ख़ुमार दूँ। तेरे हाथों की लकीरों को चूम कर सनम, तेरी हर एक बला को मैं ख़ुद पे वार दूँ। कोई गहना, कोई ज़ेवर नहीं चाहिए, तेरी सादगी को मैं चाहतों का सिंगार दूँ। तू जो हँस दे तो पतझड़ में भी फूल खिलें, तेरे रास्तों पे मैं इश्क़ की बहार दूँ। इस फ़क़ीर के लबों पे है बस तेरा नाम, अपनी आँखों से मैं इश्क़ का इज़हार दूँ।
यह कविता निश्छल, असीम और निःस्वार्थ प्रेम की एक बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति है, जहाँ प्रेमी अपने प्रिय के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर है। इसमें प्रिय की सादगी, उसकी मुस्कान और उसकी संगति को दुनिया के तमाम ऐशो-आराम से ऊपर रखा गया है। कवि अपने प्रिय के हर दुख को खुद पर लेने और जीवन के हर मोड़ पर बिना किसी शर्त के प्रेम निभाने का गहरा संकल्प व्यक्त करता है।
This poem is a beautiful expression of unconditional, boundless, and selfless love, where the lover is ready to sacrifice their entire existence for the beloved. It elevates the beloved's simplicity, smile, and companionship far above all worldly luxuries and riches. The poet expresses a deep resolve to absorb all the misfortunes of the beloved and to love them unconditionally at every turn of life.
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