बरसों के बाद हम जो मिले हैं
बरसों के बाद हम जो मिले हैं,
दिल में हज़ारों ख़्वाब खिले हैं।
नदियाँ, पहाड़ और वादियां संग देखीं,
हम तेरे संग मीलों चले हैं।
हाथों में हाथ लिए मीलों चले थे,
धूप में भी जैसे फूल खिले थे।
मंज़िल की हमको कोई फिक्र कहाँ थी,
हम तो बस तेरी राहों में ढले थे।
पर वक़्त फिर जुदाई का आ गया,
काला तूफ़ान दिल पे छा गया।
आँखें भर आईं, और दिल डर गया,
देखो न... ये वक़्त कैसे ठहर गया।
बिछड़ना लिखा था तो हम क्यों मिले थे?
सूखे चमन में ये फूल क्यों खिले थे?
तेरी हँसी में ही हम तो पले थे,
कुछ पल को ही सही, हम साथ तो चले थे!
अब लौट आया हूँ, पर सब कुछ बिखर गया,
अकेलेपन का खौफ़, मुझमें फिर से भर गया।
जो ख़्वाब बसाया था, वो पल में उजड़ गया,
देखो न... ये वक़्त कैसे ठहर गया।
लॉन्ग डिस्टेंस का ये दर्द फिर से मार गया,
आँखों से मेरे एक समंदर उतार गया।
मंज़िल करीब आई, तो राही बिछड़ गया,
हाँ... देखो न... ये वक़्त कैसे ठहर गया...
हिंदी भावार्थ
यह कविता बरसों बाद मिलने वाले दो प्रेमियों के पुनर्मिलन की खुशी और उसके तुरंत बाद आने वाले बिछड़न के गहरे दर्द को दर्शाती है। साथ बिताए हसीन पल और सुनहरे सफर की यादें जहाँ दिल को सुकून देती हैं, वहीं लॉन्ग-डिस्टेंस रिलेशनशिप की मजबूरियाँ और जुदाई का गम वक्त को थका देने वाला और ठहरा हुआ महसूस कराता है।
English Translation
This poem portrays the joy of reunion between two lovers after years, followed immediately by the profound pain of their inevitable separation. While the memories of beautiful moments spent together and their shared journey bring solace, the helplessness of a long-distance relationship and the sorrow of parting make time feel agonizingly frozen and stagnant.