तो भी चाहूँगी हाँ।

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इश्क़ सूरत से नहीं, सीरत से किया है मैंने, तुम अगर बदल भी गए, तो भी चाहूँगी हाँ। पूरी मैं भी नहीं, मुकम्मल तुम भी कहाँ हो, आख़िरी साँस तलक, ये फ़लसफ़ा निभाऊँगी हाँ। शोर अच्छा है मगर, सुकून भी ज़रूरी है, तेरी ख़ामोशियों में ही घर अपना बसाऊँगी हाँ। जिसको रूहों ने चुना हो, वो कहाँ बिछड़ते हैं, मौत के बाद भी तेरा ही साथ निभाऊँगी हाँ। इश्क़ की उम्र भले, वक़्त के संग ढल जाए, दोस्त बनके तेरे साथ सदा रह जाऊँगी हाँ।

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