तो भी चाहूँगी हाँ।

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इश्क़ सूरत से नहीं, सीरत से किया है मैंने, तुम अगर बदल भी गए, तो भी चाहूँगी हाँ। पूरी मैं भी नहीं, मुकम्मल तुम भी कहाँ हो, आख़िरी साँस तलक, ये फ़लसफ़ा निभाऊँगी हाँ। शोर अच्छा है मगर, सुकून भी ज़रूरी है, तेरी ख़ामोशियों में ही घर अपना बसाऊँगी हाँ। जिसको रूहों ने चुना हो, वो कहाँ बिछड़ते हैं, मौत के बाद भी तेरा ही साथ निभाऊँगी हाँ। इश्क़ की उम्र भले, वक़्त के संग ढल जाए, दोस्त बनके तेरे साथ सदा रह जाऊँगी हाँ।
यह कविता निस्वार्थ, आत्मिक और शाश्वत प्रेम की एक बेहद गहरी अभिव्यक्ति है, जो शारीरिक आकर्षण से परे साथी के आंतरिक गुण (सीरत) और उसकी अपूर्णताओं को सहर्ष स्वीकार करती है। कवयित्री जीवन के उतार-चढ़ाव, मौन, मृत्यु और समय के थपेड़ों से परे जाकर भी अपने प्रेम को निभाने और अंततः एक सच्चे मित्र के रूप में सदैव साथ रहने का दृढ़ संकल्प व्यक्त करती है।
This poem is a profound expression of selfless, spiritual, and eternal love that transcends physical beauty, embracing the partner's inner character and imperfections. The poet vows to honor this sacred bond beyond silence, death, and the passage of time, promising to remain a constant companion and devoted friend forever.
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