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मुझपे ही मरता है वो

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मेरी हर एक जिद को पूरा करता है वोलाख मना करके भी मुझपे मरता है वो दुनिया ने लाख जतन करे उसे पाने केदुनिया से सदा मेरे लिए लड़ता है वो  मुझे रोकता है गहराई में जाने से मगर खुद टूटे तने पे नदी पार करता है वो सुबह सुबह खलल न पड़े मेरी नींद में पर्दे लगा कर इसलिए अंधेरे भरता है वो मुझे प्रिय है उसके कंधे पे सर रख सोनातभी करवट बदलने से डरता है वो  मुझे अच्छा लगता है उसका हाथ पकड़नामेरा हाथ पकड़ के हदों में चलता है वो
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