मोहब्बत नहीं समझते
मैंने आज यूट्यूब में एक वीडियो में यह लाइनें सुनीं, जो कुछ इस तरह थीं
"जब दिल पर किसी की मोहब्बत लग गई थी,
तो जमाने की मुझ पर तोहमत लग गई थी।
एक ही जिस्म को भुलाने के लिए,
हजार जिस्म की जरूरत लग गई थी..."
इन्हें सुनकर मैं इस बात से बिल्कुल भी सहमत नहीं हो पाया। मेरे ज़ेहन में बस एक ही सवाल आया कि एक शख्स को या उसकी मोहब्बत को भुलाने के लिए अगर तुम हज़ार जिस्मों के पास गए, तो क्या तुम सच में मोहब्बत भुला रहे थे या सिर्फ अपनी हवस मिटा रहे थे?
मेरा नज़रिया यह है कि अगर उस शख्स से तुम्हें सच्ची मोहब्बत होती, तो तुम उसी की खुशी में खुश रहते। प्यार का मतलब तो ये है कि इंसान या तो ताउम्र उसी एक का होकर रह जाए, या फिर किसी और का ना हो।
मेरी इसी सोच और ख्यालों से फिर यह ग़ज़ल निकल कर आई:
हज़ारों जिस्म छूने को, मोहब्बत नहीं समझते,
बदल जाए हर शब जो, मोहब्बत नहीं समझते।
भुलाने के लिए उसको, गए हो तुम हज़ार दर पर,
हवस के इस तमाशे को, मोहब्बत नहीं समझते।
उसी के हो गए हैं हम, उसी की याद है दिल में,
नया चेहरा ढूंढने को, मोहब्बत नहीं समझते।
नशे में झूम कर हर शब, जो बाहें ढूँढ लेते हो,
हवस की इस ख़ुमारी को, मोहब्बत नहीं समझते।
हमारे इश्क़ की दुनिया, उसी की एक हँसी तक है,
जो ऐप्स पे रोज बदलते हैं, महोब्बत नहीं समझते।
'फ़क़ीर'-ए-इश्क़ हैं हम, बस इसी दौलत पे ज़िंदा हैं,
हवस को पूजने वाले, मोहब्बत नहीं समझते।
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