तू ही बता तुझे कैसे में छोड़ दूं।।
कभी कभी बादल का कोई टुकड़ा आवारा लगता हैकभी कभी मुझको तू ही जीने का सहारा लगता हैऐसे में क्यों न तुझपे अपनी में जान दूंतू ही बता तुझे कैसे में छोड़ दूं।।
कभी कभी में खुद से खुद में कंही उलझा रहता हूंकभी कभी जलसे में भी में अकेला रहता हूँऐसे में क्यों न में इस प्यार को अंजाम दूंतू ही बता तुझे कैसे में छोड़ दूं।।
रोना चाहे खुलकर रोता नहीहँसना चाहे खुलकर हंसता नहीख़्वाबों में बहका हुआ हक़ीक़त में रहता नहीकुछ प्यारे प्यारे आधे पूरे सपने ही सहीऐसे में क्यों न तुझको में पुकार लूँतू ही बता तुझे कैसे में छोड़ दूं।।
कभी कभी खवावों में भी डर लगता हैकभी कभी तो यूँ लगता है जैसे मेरा कुछ भी नहीजानें रातों को क्यों अब खुद में से डरता हूँऐसे में क्यों न तुझको में पुकार लूँतू ही बता तुझे कैसे में छोड़ दूं।।