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सच बताओ न क्या तुम मुझे अपना मानते नहीं

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मैं तुम्हारे सामने होता हूँ तब भी पहचानते नहीं, सच बताओ न क्या तुम मुझे अपना मानते नहीं। अगर मैं हूँ तुम्हारे दिल में, तो फिर छुपाते क्यों हो, मेरे ज़िक्र पर खामोश हो, जैसे कुछ जानते नहीं। हर रोज़ एक बहाना होता, मुझसे दूर जाने का, क्या अब भी दिल में चाह है या तुम जानते नहीं। ग़ैरों के बीच जो हँसते हो, लुटती हैं बातें तुम्हारी, अब मेरी ग़ज़लों में तुम खुद को पहचानते नहीं। तलाशते हो वादे वो, जो तुमने किए ही नहीं, हमने बस साथ माँगा था, क्या तुम जानते नहीं। उस मोड़ पे आज भी रुका हूँ जहाँ तुम छूटे थे, क्या अब भी वो रिश्ता अपना तुम मानते नहीं। तेरी हर ख़ामोशी में मुझसे कुछ तो कहा गया था,उन अब लफ़्ज़ों को तुम सच का पैमाना मानते नहीं।
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