और यही सोचते-सोचते...

· · 👁 456 reads
कल रात एक बहुत अजीब सा सपना देखा... एक अनजान सी भीड़ थी, और एक बहुत शोर शराबे वाला बाज़ार। उस भीड़ से बचकर मैं निकल ही रहा था... कि अचानक वो सामने से आई, और सीधा मुझसे टकरा गई। मेरे हाथ से मेरा सारा सामान नीचे बिखर गया... और उसके हाथ से उसका फ़ोन। चेहरे पर भयंकर गुस्सा, तनी हुई भौहें... वो झुंझलाते हुए बोली— 'अंधे हो क्या? दिख नहीं रहा था, मेरा फ़ोन गिर गया!' मैं हल्का सा मुस्कुराया, अपना सामान वहीं छोड़ा, और उसका फ़ोन उठाने के लिए जैसे ही हाथ आगे बढ़ाया... कि अचानक वो बाज़ार का शोर, वो भीड़, और उसका वो गुस्सा... सब गायब हो गया। मेरी आँख खुल गई। कमरे में वही भयानक खामोशी थी, और सामने खाली दीवार। सच कहूँ तो... उस सपने में उसका मुझ पर चिल्लाना, हकीकत की इस खामोशी से बहुत बेहतर था। कम से कम... कुछ पल के लिए ही सही, वो मेरे सामने तो थी।

Comments (0)

Join the conversation to share your thoughts.

Log in to comment