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जिंदगी कहां इतनी आसान

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अब रुक जाता हूँ कुछ करने से पहले सोचने लगता हूँ कुछ कहने से पहलेठोकरें खाकर अबसंभलने लगा हूँचार दिन की ज़िंदगीकहाँ इतनी आसान दो पल भी खामोशी के मिल जायें मुझे शहर के मकान मेंसारी उम्र गुजरी है मेरी गाँव के बूढ़े आम की छाँव मेंकई कई दिन गुजर जाते है चाँद को शहर से गुजरेशहर की ज़िंदगीकहाँ इतनी आसान घुमना चाहता हूँ हर अनजान अजनबी शहर मेंडूबना चाहता हूँवक़्त के समंदर मेंजिसमें यह जिस्मढल जाए औरहो जाएगा बेजानमगर रूह धड़कती रहेगी और में चलता रहूँगा क्योंकि यह ज़िंदगीकहाँ इतनी आसान
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