तरीके बदले हैं, इश्क़ नहीं
कहते हो
हमारे ज़माने में
गुलाब असली होता था
चिट्ठियों से महकता था इश्क़
और आज तो बस इमोजी भेज देते हो
कहते हो
हमने मोहब्बत को जिया था
तुम लोग तो बस
स्क्रीन पर जज़्बात सजाते हो
पर कभी सोचा है?
जिसे तुम 'आसान' समझते हो
वो इश्क़ भी किसी ने
कंपकंपाते हाथों से टाइप किया है
गुलाब हमने भी भेजा है
बस वो बगीचे से नहीं
गैलरी से आया था
पर नीयत वही थी
जिससे तुमने तोड़ा था
हम भी इंतज़ार करते हैं
ब्लू टिक के जलने का
‘टाइपिंग…’ के रुकने का
जैसे तुम डाकिए के आने का करते थे
कहते हो
हम निभाते नहीं
रिश्तों से भागते हैं
पर निभाते तो हम भी हैं
बस सबूत भेजने की आदत नहीं
तुम्हारे लिए इश्क़
काग़ज़ और क़लम था
हमारे लिए वक़्त और मौजूदगी है
कभी-कभी बस चुप रहना भी मोहब्बत है
इसलिए मत कहो
कि हमें इश्क़ नहीं आता
हमने बस उसकी भाषा बदल ली है
इश्क़ तो आज भी उतना ही गहरा है
बस काग़ज़ से चलकर
अब स्क्रीन तक आ गया है