होली
होली तो पास है, मगर रंग लगाने वाला दूर,
दिल भी है उदास और आँखें नम से भरपूर
इस बार ना हाथों में गुलाल सजेगा कोई,
पिचकारी भी सूनी है, महके न रंग का नूर।
तेरे बिना होली कुछ पतंग बिना डोर जैसी,
हर रंग बिखरा है, पर कुछ भी नहीं भरपूर।
जब तेरे संग रंग बरसते थे, भीगती थी रूह,
अब घटा तो है, पर बरसात है बहुत दूर।
तेरे हाथों से जो रंग लगते थे, बस वही थे ख़ास,
अब सब कुछ फीका लगे, मीठी भी लगे दूर।
‘ग़ज़ल’ ये कहती है चुपचाप बैठकर कोने में,
कि पास है ये त्यौहार, पर तू है बहुत दूर।