एक इशारे पे उसके दिल का दरवाजा खोल सकता है

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एक इशारे पे उसके दिल का दरवाजा खोल सकता है इश्क़ में आशिक़ अपनी बात आखों से बोल सकता है झुका लेता हूँ अपना सर हर दरगाह देख कर इबादत में इंसान राज़-ए-दिल खोल सकता है। हैरानी क्यों है अगर ढूंढ़ता हूँ मुसाफिर बात करने को अकेला इंसान अकेले कितना बोल सकता है। रुक गई है ज़िंदगी आकर एक अजब चौराहे पे, डर है इस मोड़ पर फिर मेरा यक़ीन डोल सकता है। शहरों की मेज़बानी सिमट गई है बंद मकानों में, बंद दरवाज़ों में कैसे कोई अपनापन टटोल सकता है यह चाँद टुटा हुआ एक पत्थर का टुकड़ा ही तो है फिर कैसे ये अंधेरी रातों में चाँदनी घोल सकता है। चला मैं उसी राह पर जिधर उसके पैरों के निशां मिले, मेरे दीवानेपन को भला कोई कैसे तौल सकता है। सितम न कर किसी मजलूम पे ए सितमगर सितम बेइंतहा हो तो गूंगा भी बोल सकता है। किसी को आजमाना महंगा भी पड़ सकता है किसी रोज वो तेरा राज़ भी खोल सकता है सत्ता का नशा हमेशा क़ायम रहता ही नहीं, किसी की आह से ये सिंहासन कभी भी डोल सकता है। वक़्त का पलड़ा पलटते देर कहाँ लगती है, कभी वो भी तुझे अपने पैरों तले रोल सकता है।

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