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तुझमें रब को पाया

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किसी ने पत्थर पूजे, किसी ने दीप जलाया, हमने तेरा नाम लिया, तुझमें रब को पाया। किसी ने पढ़ीं पोथियाँ, किसी ने ज्ञान सुनाया, हमने तेरा नाम लिया, तुझमें रब को पाया। कोई हज को निकला, कोई काशी में नहाया, हमने तेरा नाम लिया, तुझमें रब को पाया। किसी ने बांधी हैं मन्नतें, किसी ने पीर मनाया, हमने तेरा नाम लिया, तुझमें रब को पाया। किसी ने शब्द साधे, किसी ने मौन अपनाया, हमने तेरा नाम लिया, तुझमें रब को पाया। कोई रब को ही झुठलाए, किसी ने तर्क लड़ाया, हमने तेरा नाम लिया, तुझमें रब को पाया।
यह कविता बाह्य आडंबरों, धार्मिक कर्मकांडों और बौद्धिक तर्कों से परे प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाती है। कवि स्पष्ट करता है कि जहाँ लोग ईश्वर को खोजने के लिए तीर्थयात्रा, पूजा-पाठ और शास्त्रों का सहारा लेते हैं, वहीं उसने केवल अपने प्रिय के प्रति सच्चे समर्पण और प्रेम में ही परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया है। यह रचना संदेश देती है कि ईश्वर किसी मंदिर, मस्जिद या शास्त्र में नहीं, बल्कि निश्छल प्रेम और आत्मीयता में वास करता है।
This poem depicts the pinnacle of love, transcending external rituals, religious dogmas, and intellectual arguments. The poet clarifies that while people resort to pilgrimages, rituals, and scriptures to find God, they have realized the divine simply through true devotion and love for their beloved. This creation conveys the message that God does not reside in temples, mosques, or scriptures, but in pure love and soulful connection.
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