टकरा गए एक बाज़ार में
भीड़ से बच निकल रहे थे, और टकरा गए एक बाज़ार में,
वक़्त जैसे थम सा गया, उस पहली नज़र के इक़रार में।
आजकल रिश्तों को लोग तौलते हैं, सिर्फ़ नफ़े और नुकसान से,
पर मेरा सब कुछ लुट गया, उसकी आँखों के अनजान व्यापार में।
हर कोई गुम था वहाँ, अपनी मोबाइल स्क्रीन की अंधी दौड़ में,
मुझको एक लंबा ठहराव मिला, उस एक पल की तेज़ रफ़्तार में।
कोई ढूँढता है यूटिलिटी दिलों में, कोई सिर्फ़ चेहरे का रंग,
रूहानियत भला कहाँ मिलती है, जिस्म के इस सस्ते श्रृंगार में।
लोग कहते हैं 'फ़क़ीर' तू सच में, बहुत पीछे रह गया इस दौर से,
उन्हें क्या ख़बर कितना सुकून है, किसी अनजान के इंतज़ार में।
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