टकरा गए एक बाज़ार में
भीड़ से बच निकल रहे थे, और टकरा गए एक बाज़ार में,
वक़्त जैसे थम सा गया, उस पहली नज़र के इक़रार में।
आजकल रिश्तों को लोग तौलते हैं, सिर्फ़ नफ़े और नुकसान से,
पर मेरा सब कुछ लुट गया, उसकी आँखों के अनजान व्यापार में।
हर कोई गुम था वहाँ, अपनी मोबाइल स्क्रीन की अंधी दौड़ में,
मुझको एक लंबा ठहराव मिला, उस एक पल की तेज़ रफ़्तार में।
कोई ढूँढता है यूटिलिटी दिलों में, कोई सिर्फ़ चेहरे का रंग,
रूहानियत भला कहाँ मिलती है, जिस्म के इस सस्ते श्रृंगार में।
लोग कहते हैं 'फ़क़ीर' तू सच में, बहुत पीछे रह गया इस दौर से,
उन्हें क्या ख़बर कितना सुकून है, किसी अनजान के इंतज़ार में।
हिंदी भावार्थ
यह कविता आधुनिक युग की भौतिकवादी और व्यावसायिक मानसिकता पर प्रहार करते हुए निश्छल, रूहानी प्रेम की वकालत करती है। जहाँ आज लोग रिश्तों को मुनाफ़े, उपयोगिता और बाहरी आकर्षण की कसौटी पर कसते हैं, वहीं कवि एक बाज़ार की भीड़ में मिले क्षणिक ठहराव और निस्वार्थ प्रेम की गहराई को सर्वोपरि मानता है। यह रचना दर्शाती है कि इस भागदौड़ भरी डिजिटल दुनिया से दूर, किसी के निश्छल इंतज़ार में ही वास्तविक आत्मिक सुकून निहित है।
English Translation
This poem critiques the materialistic and transactional mindset of the modern era while advocating for pure, spiritual love. While people today evaluate relationships based on profit, utility, and external beauty, the poet prioritizes the depth of selfless love and the momentary stillness found amidst a crowded market. The work highlights that true spiritual peace lies in the selfless anticipation of someone, far away from this fast-paced digital world.