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चाहता तो तू भी है मगर इनकार कर ता है

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किस जुर्म की सजा मिलती है उसकोजो चाँद रोज रोज घटता - बढ़ ता  है तुम दूर खींचते हो खुद को जितनातुमसे तालुकात उतना और बढ़ ता है इक गहराई है तुम्हारी बातों में जरूरवर्ना कौन इस दुनिया में किसीको सुन ता है मेरी याद में तेरा भी दिन गुजरता है जरूरवर्ना इतनी रात को मैसेज कौन पड़ ता है तुझे सजा देनी है तो सजा दे डूबते सूरज कोकम्बख़्त रोज हमारे रास्तों को अलग कर ता है ऐ चाँद बुला ले तारों को जरा ओर करीब अपनेसारी रात क्यों मेरे महबूब को ताका कर ता है क्यों आजकल नींद नही है आती तुझे रातों कोइसलिए चाहता तो तू भी है मगर इनकार कर ता है न इजहार करता है न कभी इंकार करता हैमगर मुझे मालूम है तू सिर्फ मुझसे प्यार कर ता है
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