गांव के गगन में सिर्फ और सिर्फ उजियारे नज़र आते हैं।
आँखों को गाँव की रातों में इतने नज़ारे नज़र आते हैं,
अमावसहैफिरभीस्याहमेंसिर्फसितारेनज़रआतेहैं।
शहर में पूर्णिमा भी धूल-धुएँ के परदों में खो जाती है,
गांव के गगन में सिर्फ और सिर्फ उजियारे नज़र आते हैं।
गांव की हवा में भीगी नर्मी, मिट्टी में ख़ुशबू की पुकार,
यहाँ तो साँस के अंदर तक खेतों के इशारे नज़र आते हैं।
अकेला आँगन में खड़ा हूँ विरह नमक-सा घुलता है,
मेरे दिल के हर मोड़ पर मेरे गाँव के किनारे नज़र आते हैं।
पुणे की राहों पे बत्तियाँ से आँखों को थकना पड़ता है,
यहाँ तो जुगनियों की रौशनी से भी उजियारे नज़र आते हैं।
नदी के जल में उतरती रात में चेहरा धुला-धुला सा है,
वहाँ शीशे की दीवारों में बस धुंधले नज़ारे नज़र आते हैं।
मुसाफ़िरयहांआधीरातकोभीरूहमेरीपिघलपड़तीहैवहाँदिनढलनेसेपहलेहीहमथकेहारेनज़रआतेहैं।