दिल की बात दिल से हू-ब-हू कर ले
आ मिल कर आज फिर कोई गुफ़्तगू कर ले,
जो रह गई थी अधूरी पूरी वो आरज़ू कर ले।
मैं दफ़्न कर चुका था अपनी रूह को,
तू सामने आकर फिर मुझसे रूबरू कर ले।
बुझा हुआ था जो शोला मेरी रूह में बरसों से,
पास आकर इस बेचैनी को तस्कीन-ए-रूह कर ले।
तुझे भुलाने की ख़ातिर मैं ग़ैरों तक चला गया,
हुई जो इश्क़ से ग़द्दारी, उसे तू बा-वुज़ू कर ले।
मैं अपने ही इरादों से कई बार हार बैठा हूँ,
मेरी ख़ताओं को सुनकर मुझसे गुफ़्तगू कर ले।
तेरी चाहत की इक चुभन अभी तक दिल में बाक़ी है,
तू लौट आके मुकम्मल मेरी जुस्तजू कर ले।
कभी बस नाम सुना था, अब तुझे महसूस करता हूँ,
बिखरते जा रहे हैं हम, तू आकर आबरू कर ले।
न फिर से साथ रहने की कोई ज़िद है, न कोई वादा,
बस एक बार इन आँखों से दिल की गुफ़्तगू कर ले।