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पहले मिलन के बाद कि जुदाई

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तन्हाई में कुछ ऐसे कोसता है अब वह अपना नसीब काश कुछ पल रोक पाता और उसको अपने करीब रोज उसको गले लगा पाता सर माथे पे  हाथ फिरता ढूंढ़ लेता अगर उसको पास रोकने की कोई तरक़ीब नही करता सर रखने के लिए उसके कंधे का इंतजार अगर अपने अपने हाथ में होता अपना अपना नसीब डूबा कर सारे सफीने हवस का फिर रहा किनारा होता अगर रख देता अपने होठों को उसके होठों के करीब हुस्न हासिल हो जाता और कसमें बातें बन रह जाती इसलिए मदहोशी में भी नही भुला में अपनी तहजीब ओझल होता उसको देख कर मन हुआ बड़ा अजीब काश, रोक लेता कुछ पल और उसको अपने करीब
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