न रूह मिले ना तन मिले, फिर कैसा वो प्यार

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सब धरती को कागज़ करूँ, लेखनी हो बनराय सात समुंदर मसि करूँ, प्रेम लिखा न जाय न रूह मिले ना तन मिले, फिर कैसा वो प्यार रूह बिन तन है प्राणहीन, हाड़-माँस का जाल प्रेम खातिर दे दे जान, यह बहुत आसान है सुख-दुख में जो साथ निभाए, वो सच्चा है प्यार रंग-रूप, ज़ात-लिंग, ऊँच-नीच, ना कोई भेद प्यार वो भावना जो दूर करे समाज के भेदभाव आवेग में एक दिल हेतु, कितने तोड़े तू दिल माँ-बाप का घर छोड़ना, क्या सच्चा है प्यार दो तन बस संग घूमना, वो होता नहीं प्यार एक दूजे की रूह में बसना, सच्चा वो प्यार
यह कविता प्रेम की वास्तविक और गहन परिभाषा को रेखांकित करती है, जहाँ प्रेम केवल शारीरिक आकर्षण या क्षणिक आवेग नहीं, बल्कि दो आत्माओं का गहरा मिलन है। कवि के अनुसार, सच्चा प्रेम सामाजिक बंधनों, जाति-भेद और स्वार्थ से परे होता है, जो जीवन के हर सुख-दुख में साथ निभाने और अपनों के प्रति जिम्मेदारी समझने में निहित है।
This poem outlines the true and profound definition of love, emphasizing that it is not merely physical attraction or momentary impulse, but a deep union of two souls. According to the poet, true love transcends societal barriers, caste, and selfishness, finding its essence in standing together through life's ups and downs while respecting one's responsibilities towards family.
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