ऐसा भी हो सकता था

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तुम कहते हो मिल न पाए, बंधन तो तुमने डाले थे। तुम खुद वो दीवार गिराते, ऐसा भी हो सकता था। दुनिया की बातों में आकर, तुमने मुझसे दूरी की। दुनिया की तुम फिक्र न करते, ऐसा भी हो सकता था। अपने भरे-भरे आंगन में, तुम तो पहले से निहाल थे। कुछ मेरे भी ख्वाब सजाते, ऐसा भी हो सकता था। तेरी खुशी में खुशी मेरी, इसलिए लब सियें है मैंने। बिना कहे तुम दर्द समझते, ऐसा भी हो सकता था। अब जो चोरी-छिपे मिलते हैं, एक डर सा दिल में रहता है। बिना खौफ के बांह फैलाते, ऐसा भी हो सकता था। बंद कमरे में छुपके रोते हो, अपनी मजबूरी पे पछताते हो। वक़्त रहते अगर कदम उठाते, ऐसा भी हो सकता था। महफ़िल में जब टकराते हैं, अनजान बनके गुज़र जाते हैं। मेरा हाथ पकड़ तुम रुक जाते, ऐसा भी हो सकता था। मुझसे नज़रें अब चुराते हो, अपना दर्द छुपाते फिरते हो। एक बार सीने से लग जाते, ऐसा भी हो सकता था। मैं चुपचाप पीछे हट गया, अपना प्यार कुर्बान किया। मेरी खातिर तुम रुक जाते, ऐसा भी हो सकता था। मैंने दे दीं बस दुआएं तुझको, और दिल में तुझे बसा लिया। हम दोनों अपना जहां बसाते, ऐसा भी हो सकता था।
यह कविता अधूरे प्रेम, सामाजिक बंधनों और जीवन में छूटे हुए अवसरों के गहरे पछतावे को व्यक्त करती है। कवि उस दर्द को रेखांकित करता है जहाँ साहस की कमी और दुनिया के डर से दो चाहने वाले अलग हो गए, जबकि थोड़ा सा प्रयास इस नियति को बदल सकता था। यह रचना 'क्या हो सकता था' के उस टीसते हुए अहसास को दर्शाती है, जो जीवनभर एक मूक कसक बनकर दिल में रह जाता है।
This poem expresses the deep regret of unfulfilled love, societal constraints, and missed opportunities in life. The poet highlights the pain where, due to a lack of courage and fear of the world, two lovers parted ways, whereas a little effort could have changed this destiny. This piece depicts the aching realization of 'what could have been', which remains in the heart as a silent, lifelong pang.
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