घर की पुकार बुलाती है
ये शहर की ऊँची बिल्डिंगे
दिल को नहीं सुहाती है
पहाड़ों की याद आती है
मुझे घर की पुकार बुलाती है
हाँ घर की पुकार बुलाती है
शहर की भीड़ में खो गया हूँ
अपने घर से दूर हो गया हूँ
मां की ममता, वो यादें पुरानी
सुननी है मुझे उनसे कहानी
हाँ घर की पुकार बुलाती है
शहर की ऊँची इमारतों में
दिल ढूंढता हिमाचली राहों को
रंग बिरंगी रौशनी में मशग़ूल
याद आती है घर की वो पुकार
पहाड़ों की गोद में चैन मिलता
मेरा मन वही पे है बस्ता
हाँ घर की पुकार बुलाती है
हिंदी भावार्थ
यह कविता शहरी चकाचौंध और कंक्रीट के जंगलों के बीच खोए हुए एक प्रवासी के मन की गहरी तड़प और मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम को दर्शाती है। कवि शहर की भीड़भाड़ और कृत्रिमता से दूर अपने पहाड़ी घर, माँ की ममता और पहाड़ों की शांत गोद में वापस लौटने के लिए व्याकुल है, जहाँ उसका असली सुकून और आत्मा बसती है।
English Translation
This poem reflects the deep yearning of a migrant lost amidst urban glamour and concrete jungles, highlighting an intense love for their homeland. The poet longs to escape the city's crowd and artificiality to return to their mountainous home, mother's affection, and the peaceful lap of the hills, where their true peace and soul reside.