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Sahir Ludhianvi
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मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया बर्बादियों का सोग मनाना फ़ुज़ूल था बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया जो खो गया मैं उस को भुलाता चला गया ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया

यह कविता जीवन को उसकी संपूर्णता में स्वीकार करने और हर परिस्थिति में तटस्थ रहने का गहरा संदेश देती है। कवि अतीत के नुकसानों पर शोक मनाने के बजाय वर्तमान को अपनाने और सुख-दुख से परे मन की एक ऐसी समतावादी स्थिति प्राप्त करने की बात करता है जहाँ चिंताएँ और परेशानियाँ बेअसर हो जाती हैं। यह जीवन को बिना किसी शिकायत के, सहजता और जीवंतता के साथ जीने का एक उत्कृष्ट दर्शन है।
This poem conveys a profound message of accepting life in its entirety and remaining detached in every situation. Instead of mourning past losses, the poet speaks of embracing the present and achieving an equanimous state of mind beyond joy and sorrow, where worries and anxieties lose their power. It is an exquisite philosophy of living life with ease, resilience, and vitality, without any complaints.
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