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Sahir Ludhianvi
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चेहरे पे ख़ुशी छा जाती है आँखों में सुरूर आ जाता है

चेहरे पे ख़ुशी छा जाती है आँखों में सुरूर आ जाता है जब तुम मुझे अपना कहते हो अपने पे ग़ुरूर आ जाता है तुम हुस्न की ख़ुद इक दुनिया हो शायद ये तुम्हें मालूम नहीं महफ़िल में तुम्हारे आने से हर चीज़ पे नूर आ जाता है हम पास से तुम को क्या देखें तुम जब भी मुक़ाबिल होते हो बेताब निगाहों के आगे पर्दा सा ज़रूर आ जाता है जब तुम से मोहब्बत की हम ने तब जा के कहीं ये राज़ खुला मरने का सलीक़ा आते ही जीने का शुऊ'र आ जाता है

यह कविता प्रेम की गहन और रूपांतरकारी शक्ति को दर्शाती है, जहाँ प्रियतम की स्वीकृति प्रेमी के अस्तित्व को गौरव और आनंद से भर देती है। सौंदर्य और समर्पण के माध्यम से, यह रचना यह गहरा रहस्य उजागर करती है कि प्रेम में खुद को पूरी तरह मिटा देने (समर्पण करने) के बाद ही जीवन जीने का वास्तविक सलीका और सार्थकता प्राप्त होती है।
This poem beautifully depicts the profound and transformative power of love, where the beloved's acceptance fills the lover's existence with pride and joy. Through themes of beauty and surrender, it reveals the deep secret that only by completely losing oneself in love does one truly learn the art and wisdom of living.
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