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Sahir Ludhianvi
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दूर रह कर न करो बात क़रीब आ जाओ

दूर रह कर न करो बात क़रीब आ जाओ याद रह जाएगी ये रात क़रीब आ जाओ एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूने की आज बस में नहीं जज़्बात क़रीब आ जाओ सर्द झोंकों से भड़कते हैं बदन में शो'ले जान ले लेगी ये बरसात क़रीब आ जाओ इस क़दर हम से झिजकने की ज़रूरत क्या है ज़िंदगी भर का है अब साथ क़रीब आ जाओ

यह कविता प्रेम की गहन व्याकुलता, अंतरंगता और समर्पण को दर्शाती है, जहाँ प्रेमी अपनी प्रियतमा से दूरियाँ मिटाकर समीप आने का आग्रह कर रहा है। वर्षा ऋतु और ठंडी हवाओं के बीच उठने वाली विरह की तड़प को मिटाने और जीवनभर के अटूट साथ को स्वीकार करते हुए संकोच त्यागने का यह एक अत्यंत भावुक और आत्मीय आह्वान है।
This poem beautifully depicts the intense longing, intimacy, and surrender of love, where the lover pleads with their beloved to bridge the distance and come closer. Set against the backdrop of cold breezes and rain, it is an emotional call to overcome hesitation and embrace a lifetime of togetherness, turning their yearning into an unforgettable union.
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