Mirza Ghalib
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न पूछ सीना-ए-आशिक़ से
ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है निगाह दिल से तिरे सुर्मा-सा निकलती है फ़शार-ए-तंगी-ए-ख़ल्वत से बनती है शबनम सबा जो ग़ुंचे के पर्दे में जा निकलती है न पूछ सीना-ए-आशिक़ से आब-ए-तेग़-ए-निगाह कि ज़ख्म-ए-रौज़न-ए-दर से हवा निकलती है ब-रंग-ए-शीशा हूँ यक-गोश-ए-दिल-ए-ख़ाली कभी परी मिरी ख़ल्वत में आ निकलती है
हिंदी भावार्थ
यह रचना प्रेम की अत्यंत सूक्ष्म और गहरी अनुभूतियों को दर्शाती है, जहाँ प्रेमी की खामोशी में भी एक अनोखा सौंदर्य और तड़प छिपी है। कवि कहते हैं कि प्रियतम की तीखी नज़रों के घाव को सहना और एकांत के खालीपन में उसकी यादों को संजोना ही सच्चे प्रेम की पराकाष्ठा है। यह कविता विरह की वेदना को प्रकृति के तत्वों और रूपकों के माध्यम से बेहद खूबसूरती से बयां करती है।
English Translation
This poem depicts the extremely subtle and deep emotions of love, where even in the lover's silence, a unique beauty and yearning are hidden. The poet suggests that enduring the wounds of the beloved's sharp gaze and harboring their memories in the emptiness of solitude is the pinnacle of true love. It beautifully expresses the pain of separation through natural elements and profound metaphors.