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Mirza Ghalib
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जिस बज़्म में तू नाज़ से गुफ़्तार में आवे

जिस बज़्म में तू नाज़ से गुफ़्तार में आवे जाँ कालबद-ए-सूरत-ए-दीवार में आवे साए की तरह साथ फिरें सर्व ओ सनोबर तू इस क़द-ए-दिलकश से जो गुलज़ार में आवे तब नाज़-ए-गिराँ माइगी-ए-अश्क बजा है जब लख़्त-ए-जिगर दीदा-ए-ख़ूँ-बार में आवे दे मुझ को शिकायत की इजाज़त कि सितमगर कुछ तुझ को मज़ा भी मिरे आज़ार में आवे उस चश्म-ए-फ़ुसूँ-गर का अगर पाए इशारा तूती की तरह आइना गुफ़्तार में आवे काँटों की ज़बाँ सूख गई प्यास से या रब इक आबला-पा वादी-ए-पुर-ख़ार में आवे मर जाऊँ न क्यूँ रश्क से जब वो तन-ए-नाज़ुक आग़ोश-ए-ख़म-ए-हल्क़ा-ए-ज़ुन्नार में आवे ग़ारत-गर-ए-नामूस न हो गर हवस-ए-ज़र क्यूँ शाहिद-ए-गुल बाग़ से बाज़ार में आवे तब चाक-ए-गरेबाँ का मज़ा है दिल-ए-नालाँ जब इक नफ़स उलझा हुआ हर तार में आवे आतिश-कदा है सीना मिरा राज़-ए-निहाँ से ऐ वाए अगर मा'रिज़-ए-इज़हार में आवे गंजीना-ए-मअ'नी का तिलिस्म उस को समझिए जो लफ़्ज़ कि 'ग़ालिब' मिरे अशआ'र में आवे

मिर्ज़ा ग़ालिब की यह उत्कृष्ट ग़ज़ल प्रियतम के सौंदर्य, उनकी सम्मोहक आवाज़ और उनके जादुई प्रभाव का चित्रण करती है। वे कहते हैं कि महफ़िल में महबूब के बोलने मात्र से निर्जीव चित्रों में भी प्राण आ जाते हैं और उनके काव्य का हर एक शब्द गहरे अर्थों का तिलिस्मी खजाना है। यह रचना प्रेम की पराकाष्ठा, विरह की तड़प और ग़ालिब की अद्वितीय काव्य-प्रतिभा को दर्शाती है।
This exquisite ghazal by Mirza Ghalib portrays the beloved's beauty, captivating voice, and magical impact. He suggests that when the beloved speaks in a gathering, even lifeless figures on the wall come alive, and every word in his poetry is a talismanic treasure of deep meaning. The verses beautifully capture the ecstasy of love, the pain of longing, and Ghalib's unparalleled poetic genius.
Mirza Ghalib
रचनाकार
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