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Mirza Ghalib
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दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है आख़िर इस दर्द की दवा क्या है हम हैं मुश्ताक़ और वो बे-ज़ार या इलाही ये माजरा क्या है मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ काश पूछो कि मुद्दआ क्या है जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं ग़म्ज़ा ओ इश्वा ओ अदा क्या है शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं क्यूँ है निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए हैं अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है हाँ भला कर तिरा भला होगा और दरवेश की सदा क्या है जान तुम पर निसार करता हूँ मैं नहीं जानता दुआ क्या है मैं ने माना कि कुछ नहीं ग़ालिब मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है

यह ग़ज़ल मिर्ज़ा ग़ालिब की दार्शनिक और प्रेमपूर्ण अभिव्यक्ति का शिखर है, जहाँ वे अपने नादान दिल से उसकी बेचैनी का कारण पूछते हैं। इसमें ईश्वर, सृष्टि, प्रेम की एकतरफा तड़प और मानवीय अस्तित्व के रहस्यों पर गहरे सवाल उठाए गए हैं, जो जीवन की विडंबनाओं को खूबसूरती से दर्शाते हैं।
This ghazal is a pinnacle of Mirza Ghalib's philosophical and romantic expression, where he questions his naive heart about the cause of its restlessness. It raises profound questions about God, creation, the unrequited agony of love, and the mysteries of human existence, beautifully depicting life's inherent ironies.
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रचनाकार
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